भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक है और रोज़ करोड़ों लोग इससे सफर करते हैं। प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर आपने कभी ध्यान दिया होगा कि कुछ डिब्बों की खिड़कियों के ऊपर पीली या हरी तिरछी धारियाँ होती हैं, आखिरी डिब्बे पर बड़ा सा X बना होता है और हर डिब्बे पर एक 5 अंकों का नंबर लिखा होता है।
ये निशान सजावट के लिए नहीं हैं। हर एक का अपना काम है, जो यात्रियों और रेलकर्मियों दोनों की मदद करता है। आइए एक-एक करके समझते हैं।
नीले डिब्बे पर पीली धारियाँ: जनरल डिब्बा
पुराने नीले ICF डिब्बों में जिन डिब्बों के आखिरी हिस्से में खिड़कियों के ऊपर पीली धारियाँ होती हैं, वे आम तौर पर अनारक्षित (जनरल) सेकंड क्लास डिब्बे होते हैं।
इसका फायदा सबसे ज़्यादा उन यात्रियों को होता है जिनके पास जनरल टिकट है। ट्रेन के प्लेटफॉर्म पर आते ही भीड़ में दौड़कर हर डिब्बे का बोर्ड पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती, दूर से ही पीली धारियाँ देखकर पता चल जाता है कि किधर जाना है। जिन लोगों को पढ़ना नहीं आता, उनके लिए भी यह रंग का निशान बहुत काम का है।
धूसर डिब्बे पर पीली धारियाँ: दिव्यांग और बीमार यात्रियों के लिए
कई ट्रेनों में, खासकर लोकल और उपनगरीय ट्रेनों में, धूसर (ग्रे) रंग के डिब्बे पर पीली धारियाँ इस बात का संकेत होती हैं कि यह डिब्बा दिव्यांग और बीमार यात्रियों के लिए आरक्षित है।
धूसर डिब्बे पर हरी धारियाँ: महिलाओं का डिब्बा
इसी तरह कई लोकल ट्रेनों में धूसर डिब्बे पर हरी धारियाँ यह बताती हैं कि यह महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बा है। मुंबई जैसी भीड़ वाली लोकल में यह पहचान बहुत काम आती है, जहाँ ट्रेन कुछ ही सेकंड के लिए रुकती है।
ध्यान रखें कि अलग-अलग ज़ोन और नई ट्रेनों में रंग का इस्तेमाल थोड़ा अलग हो सकता है, इसलिए डिब्बे पर लिखा बोर्ड हमेशा अंतिम पहचान है।
आखिरी डिब्बे पर X और LV बोर्ड
हर ट्रेन के आखिरी डिब्बे के पीछे सफेद या पीले रंग में बड़ा सा X बना होता है। साथ में अक्सर LV लिखा एक बोर्ड लटका होता है, जिसका मतलब है Last Vehicle, यानी आखिरी डिब्बा। रात में यहाँ एक लाल बत्ती भी जलती-बुझती है।
यह निशान सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। जब ट्रेन किसी स्टेशन से गुज़रती है, तो वहाँ का स्टाफ देखता है कि आखिरी डिब्बे पर X और LV है या नहीं। अगर यह निशान नहीं दिखता, तो इसका मतलब हो सकता है कि ट्रेन के कुछ डिब्बे रास्ते में अलग होकर पीछे छूट गए हैं। ऐसे में तुरंत अगले स्टेशन और कंट्रोल रूम को सूचना दी जाती है, ताकि पीछे से आने वाली ट्रेन उन डिब्बों से न टकराए।
नीले और लाल डिब्बे में क्या फर्क है
भारतीय रेल में आपको दो तरह के डिब्बे सबसे ज़्यादा दिखेंगे:
| डिब्बा |
पहचान |
खासियत |
| ICF कोच |
ज़्यादातर नीले रंग के |
पुराना डिज़ाइन, चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री के नाम पर |
| LHB कोच |
ज़्यादातर लाल या नए रंगों में |
नया डिज़ाइन, हल्के, तेज़ रफ्तार के लिए बने और ज़्यादा सुरक्षित |
LHB डिब्बे स्टेनलेस स्टील के बने होते हैं और दुर्घटना की स्थिति में एक डिब्बा दूसरे पर चढ़ने की संभावना कम होती है। यही कारण है कि रेलवे धीरे-धीरे पुराने ICF डिब्बों की जगह LHB डिब्बे ला रहा है।
डिब्बे पर लिखा 5 अंकों का नंबर
पुराने ICF डिब्बों पर लिखे 5 अंकों के नंबर में पहले दो अंक आम तौर पर बताते हैं कि डिब्बा किस साल बना था। जैसे किसी डिब्बे पर 04052 लिखा हो, तो वह आम तौर पर 2004 में बना माना जाता है। बाकी तीन अंक डिब्बे का प्रकार बताते हैं, जैसे स्लीपर, AC या जनरल।
नए डिब्बों में नंबरिंग का तरीका अलग हो सकता है, पर पुराने डिब्बों में यह तरीका लंबे समय तक इस्तेमाल हुआ है।
कुछ और निशान जिन्हें आप पहचान सकते हैं
- डिब्बे के दरवाज़े के पास लिखा कोच कोड: जैसे S1, B2, A1, H1। S स्लीपर, B थर्ड AC, A सेकंड AC और H फर्स्ट AC के लिए आम तौर पर इस्तेमाल होता है।
- खिड़की पर लाल पट्टी वाली खिड़की: यह इमरजेंसी खिड़की होती है, जिसे ज़रूरत पड़ने पर खोलकर बाहर निकला जा सकता है।
- चेन पुलिंग: बिना ठोस वजह के चेन खींचना कानूनन अपराध है और इस पर जुर्माना या सज़ा हो सकती है।
आखिरी बात
अगली बार जब आप प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का इंतज़ार करें, तो इन निशानों पर ध्यान दीजिए। पीली धारियाँ आपको सही डिब्बे तक पहुँचाएँगी, X निशान आपको बताएगा कि ट्रेन पूरी है, और कोच नंबर से आप जान सकेंगे कि आपका डिब्बा कितना पुराना है। छोटी-छोटी बातें, पर सफर को आसान और सुरक्षित बनाती हैं।