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कानून

"शादी हो गई, अब हक़ कैसा?" — जानिए कोर्ट क्या कहता है

पिता की संपत्ति में बेटी का हिस्सा शादी के बाद ख़त्म नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में साफ़ कहा था कि ये हक़ जन्म से मिलता है — और बेटे के बराबर मिलता है।

सुमिता रवानी3 मिनट का पाठ
बेटी का पिता की पैतृक संपत्ति पर हक़ जन्म से होता है

एक नज़र में

  • बेटी का पिता की पैतृक संपत्ति पर हक़ जन्म से होता है, शादी से इस पर कोई असर नहीं पड़ता
  • 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2005 के संशोधन के समय पिता का जीवित होना ज़रूरी नहीं
  • यह हक़ बेटे के बराबर है — आधा या कम नहीं
  • पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर भी बेटी का वारिस के तौर पर हक़ बनता है
  • बँटवारा हो चुका हो तो दावे की समय-सीमा लागू होती है, इसलिए देर करना नुकसानदेह है

घर में बँटवारे की बात चलती है। कागज़ निकलते हैं। और फिर वो एक लाइन आती है जो लगभग हर परिवार में सुनाई देती है —

"तुम्हारी तो शादी हो गई। अब तुम्हारा क्या हक़?"

बात इतने भरोसे से कही जाती है कि सुनने वाली बहन भी मान लेती है। कागज़ पर दस्तख़त हो जाते हैं और मामला ख़त्म।

लेकिन कानून की नज़र में ये बात ग़लत है।

सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी

बेटी का पिता की पैतृक संपत्ति पर हक़ शादी से नहीं जुड़ा है।

पुराने ज़माने में यह सोच इसलिए बनी क्योंकि तब कानून वाकई अलग था — बेटी को शादी तक भरण-पोषण का सीमित अधिकार था, संपत्ति बेटे को जाती थी।

लेकिन वो कानून 2005 में बदल दिया गया। और उसके बाद अदालतों ने कई बार साफ़ किया कि अब स्थिति क्या है।

2020 का वो फ़ैसला जिसने सब तय कर दिया

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने 2020 में एक बड़ा सवाल तय किया।

सवाल ये था — अगर 2005 में कानून बदलने से पहले ही पिता की मृत्यु हो चुकी हो, तो क्या बेटी को हक़ मिलेगा?

अदालत का जवाब था: हाँ।

कोर्ट ने कहा कि ये अधिकार जन्म से मिलता है, और बेटी को ठीक उसी तरह और उन्हीं शर्तों के साथ मिलता है जैसे बेटे को मिलता है — मानो वो जन्म से ही सहदायिक (coparcener) रही हो।

यानी दो बातें तय हो गईं। पहली, हक़ जन्म से है। दूसरी, पिता का 2005 में जीवित होना ज़रूरी नहीं।

पैतृक और स्वअर्जित — फ़र्क़ समझ लीजिए

ये दो अलग चीज़ें हैं और अक्सर गड़बड़ यहीं होती है।

पैतृक संपत्ति वो है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना बँटवारे के चली आ रही हो। इसमें बेटी का हक़ जन्म से है, बेटे के बराबर।

स्वअर्जित संपत्ति वो है जो पिता ने ख़ुद कमाकर बनाई। जीते जी पिता इसे जिसे चाहें दे सकते हैं या वसीयत कर सकते हैं। लेकिन अगर बिना वसीयत के मृत्यु हो जाए, तो बेटी वारिस के तौर पर हिस्सेदार बनती है — सुप्रीम कोर्ट 2022 में यह भी साफ़ कर चुका है।

एक बात और — अगर संयुक्त परिवार की संपत्ति का विधिवत बँटवारा हो चुका है, तो हर हिस्सेदार को मिला हिस्सा उसकी अपनी स्वअर्जित संपत्ति बन जाता है।

समय पर ध्यान दीजिए

अगर संपत्ति अब तक बँटी नहीं है, तो हक़ बना रहता है।

लेकिन अगर बँटवारा हो चुका है, तो दावा करने की समय-सीमा लागू होती है — आमतौर पर बँटवारे की जानकारी होने की तारीख़ से 12 साल।

यही वजह है कि "बाद में देख लेंगे" वाला रवैया सबसे ज़्यादा नुकसान करता है।

जो बातें अक्सर ग़लत बताई जाती हैं

"शादी में दहेज दे दिया था, अब हिसाब बराबर" — कानून में दहेज और उत्तराधिकार का कोई संबंध नहीं है। दहेज लेना-देना अपने आप में अपराध है।

"बेटी को आधा मिलेगा" — नहीं। बेटे के बराबर।

"मायके छोड़ दिया तो हक़ छोड़ दिया" — रहने या न रहने से उत्तराधिकार पर असर नहीं पड़ता।

"पिता नहीं रहे, अब कुछ नहीं होगा" — 2020 का फ़ैसला ठीक इसी स्थिति के लिए है।

आगे क्या करें

पहला काम — कागज़ इकट्ठा कीजिए। संपत्ति के दस्तावेज़, ख़सरा-खतौनी, म्यूटेशन रिकॉर्ड, वसीयत अगर हो।

दूसरा — अगर कोई बँटवारा पत्र या रिलीज़ डीड आपके सामने रखा जाए, तो पढ़े बिना दस्तख़त मत कीजिए। परिवार का दबाव इसी मोड़ पर सबसे ज़्यादा होता है।

तीसरा — किसी वकील से बात कीजिए। हर परिवार की स्थिति अलग होती है और यह लेख सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं।

और सबसे ज़रूरी बात — हक़ माँगने का मतलब रिश्ते तोड़ना नहीं होता। ज़्यादातर मामलों में बात सिर्फ़ इसलिए बिगड़ती है क्योंकि किसी को पता ही नहीं होता कि कानून असल में कहता क्या है।

हक़ जन्म से मिलता है। शादी से नहीं जाता।

सुमिता रवानी

सुमिता रवानी

सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट — सरकारी योजना और नागरिक सेवाएं

सुमिता रवानी 8 साल से केंद्र और राज्य सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं पर लिख रही हैं। उनका काम सरकारी अधिसूचनाओं और पोर्टल की उलझी भाषा को आम पाठक के लिए आसान बनाना है। वे विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाओं तक पहुँच की समस्या पर रिपोर्टिंग करती रही हैं।