अक्टूबर के आखिर से लेकर जनवरी तक उत्तर भारत के कई शहरों में आसमान धुंधला दिखता है, आँखों में जलन होती है और गले में खराश रहने लगती है। ठंडी हवा, कम हवा का बहाव, गाड़ियों का धुआँ, निर्माण की धूल और पराली जलाना, ये सब मिलकर हवा को भारी बना देते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायु प्रदूषण दिल, फेफड़ों और साँस की बीमारियों का बड़ा कारण है। सबसे ज़्यादा खतरा हवा में तैरते बहुत बारीक कणों PM2.5 से है, जो इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों में गहराई तक पहुँच जाते हैं। हम हवा बदल नहीं सकते, पर उसमें अपनी साँसों को बचाने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं।
AQI का मतलब समझिए
AQI यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स बताता है कि हवा कितनी साफ़ या गंदी है। भारत में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) इसके ये स्तर बताता है:
| AQI |
स्तर |
क्या मतलब |
| 0-50 |
अच्छा |
कोई खास दिक्कत नहीं |
| 51-100 |
संतोषजनक |
संवेदनशील लोगों को हल्की तकलीफ़ |
| 101-200 |
मध्यम |
फेफड़ों, दिल के मरीज़ों, बच्चों और बुज़ुर्गों को दिक्कत |
| 201-300 |
खराब |
लंबे समय तक रहने पर ज़्यादातर लोगों को तकलीफ़ |
| 301-400 |
बहुत खराब |
लंबे समय तक रहने पर साँस की बीमारी का खतरा |
| 401-500 |
गंभीर |
स्वस्थ लोगों पर भी असर, बीमारों के लिए खतरनाक |
अपने शहर का AQI रोज़ देखने के लिए CPCB का SAMEER ऐप इस्तेमाल कर सकते हैं।
8 आसान तरीके जो सच में मदद करते हैं
1. सही मास्क पहनें
कपड़े का मास्क या सर्जिकल मास्क PM2.5 जैसे बारीक कणों को ठीक से नहीं रोकते। प्रदूषण में N95 या FFP2 जैसे मास्क ज़्यादा असरदार होते हैं, बशर्ते वे नाक और ठुड्डी पर अच्छी तरह फिट हों और किनारों से हवा न आए। एक ही मास्क को कई दिन तक न चलाएँ।
2. सुबह की सैर का समय बदलें
सर्दियों में सुबह-सुबह और देर शाम प्रदूषण अक्सर ज़्यादा होता है क्योंकि ठंडी हवा धुएँ को ज़मीन के पास रोक लेती है। जिन दिनों AQI खराब या उससे ऊपर हो, बाहर दौड़ने या तेज़ कसरत की जगह घर के अंदर योग, स्ट्रेचिंग या हल्की कसरत करें।
3. ज़्यादा प्रदूषण के घंटों में खिड़कियाँ बंद
जब बाहर की हवा बहुत खराब हो, खिड़की-दरवाज़े बंद रखें। हवा थोड़ी साफ़ हो, आम तौर पर दोपहर में धूप निकलने पर, तब कुछ देर के लिए खोलें।
4. घर के अंदर प्रदूषण न बढ़ाएँ
अगरबत्ती, धूपबत्ती, मच्छर की कॉइल, घर में सिगरेट और बिना चिमनी के तड़का, ये सब घर के अंदर की हवा को और भारी बना देते हैं। प्रदूषण के मौसम में इन्हें कम से कम करें और रसोई में एग्ज़ॉस्ट या चिमनी चलाएँ।
5. एयर प्यूरीफायर हो तो सही जगह लगाएँ
HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर कमरे की हवा से बारीक कण कम करता है। इसे उस कमरे में चलाएँ जहाँ आप सबसे ज़्यादा समय बिताते हैं, खासकर सोने का कमरा, और कमरा बंद रखें। फिल्टर समय पर बदलें।
पौधे घर को अच्छा बनाते हैं, पर अकेले पौधों से कमरे का प्रदूषण असरदार तरीके से कम नहीं होता, इसलिए इन पर पूरी तरह भरोसा न करें।
6. खूब पानी और पौष्टिक खाना
पर्याप्त पानी गले और नाक की झिल्ली को नम रखता है। मौसमी फल, हरी सब्ज़ियाँ और दाल वाला संतुलित खाना शरीर की ताकत बनाए रखने में मदद करता है। किसी एक काढ़े या जूस को प्रदूषण का इलाज न मानें।
7. गाड़ी में भी ध्यान
ट्रैफिक में गाड़ी की खिड़कियाँ बंद रखें और AC को रीसर्कुलेशन मोड पर चलाएँ। दोपहिया पर चलते समय अच्छा मास्क पहनें।
8. लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करें
लगातार खाँसी, सीने में जकड़न, साँस फूलना, घरघराहट या आँखों में तेज़ जलन हो तो डॉक्टर से मिलें। अस्थमा या COPD के मरीज़ अपनी दवाइयाँ और इनहेलर समय पर लें और साथ रखें।
किन्हें सबसे ज़्यादा सावधानी चाहिए
- बच्चे: उनके फेफड़े विकसित हो रहे होते हैं और वे बड़ों से तेज़ साँस लेते हैं। खराब AQI वाले दिनों में बाहर खेलने का समय घटाएँ।
- बुज़ुर्ग: दिल और फेफड़ों की बीमारी का खतरा ज़्यादा होता है।
- गर्भवती महिलाएँ: प्रदूषण वाले दिनों में बाहर कम निकलें और डॉक्टर की सलाह से अपना ध्यान रखें।
- अस्थमा, एलर्जी, दिल या डायबिटीज़ के मरीज़: अपने डॉक्टर से प्रदूषण के मौसम की योजना पहले से बना लें।
आखिरी बात
प्रदूषण से पूरी तरह बचना मुश्किल है, पर हर दिन का AQI देखकर बाहर जाने का समय तय करना, सही मास्क, घर के अंदर धुआँ कम करना और लक्षणों पर नज़र रखना, ये छोटे कदम आपके परिवार के फेफड़ों पर बड़ा फर्क डालते हैं। यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है, किसी बीमारी में अपने डॉक्टर की सलाह मानें।