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सैलरी आते ही खत्म? 50-30-20 नियम से बचाएँ पैसा

By payalk.in डेस्क-21 अक्टूबर 20265 मिनट1

महीने की 20 तारीख आते-आते जेब खाली हो जाती है? दिक्कत कम सैलरी नहीं, बिना नियम का खर्च है। 50-30-20 नियम से जानिए हर रुपये की सही जगह।

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सैलरी आने के पहले हफ्ते में सब ठीक लगता है। दूसरे हफ्ते में थोड़ी शॉपिंग, बाहर का खाना और कुछ ऑनलाइन ऑर्डर। तीसरे हफ्ते तक बैलेंस देखकर डर लगने लगता है और आखिरी हफ्ता अगली सैलरी के इंतज़ार में कटता है। अगर यह कहानी आपकी भी है, तो जान लीजिए कि ज़्यादातर मामलों में समस्या कम कमाई नहीं, बल्कि बिना योजना का खर्च है।

इसका सबसे आसान इलाज है 50-30-20 नियम। यह बजट बनाने का ऐसा तरीका है जिसमें न लंबा हिसाब-किताब चाहिए, न कोई ऐप। बस तीन हिस्से याद रखने हैं।

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50-30-20 नियम क्या है

इस नियम में आपकी हाथ में आने वाली सैलरी, यानी टैक्स और PF कटने के बाद की रकम, तीन हिस्सों में बँटती है:

  • 50 प्रतिशत: ज़रूरतें। वो खर्च जिनके बिना जीना मुश्किल है, जैसे किराया, राशन, बिजली-पानी, मोबाइल रिचार्ज, आने-जाने का किराया, बच्चों की फीस और ज़रूरी EMI।
  • 30 प्रतिशत: इच्छाएँ। वो खर्च जो ज़िंदगी को मज़ेदार बनाते हैं पर ज़रूरी नहीं, जैसे बाहर खाना, फिल्म, OTT, नए कपड़े, घूमना और गैजेट।
  • 20 प्रतिशत: बचत और निवेश। इमरजेंसी फंड, SIP, PPF, बीमा का प्रीमियम या कर्ज़ जल्दी चुकाना।

इस नियम को अमेरिकी सीनेटर एलिज़ाबेथ वॉरेन ने अपनी किताब में लोकप्रिय बनाया था, पर इसकी खूबी यह है कि यह किसी भी देश और किसी भी सैलरी पर लागू हो सकता है।

30,000 रुपये की सैलरी का पूरा उदाहरण

मान लीजिए आपके हाथ में हर महीने 30,000 रुपये आते हैं:

हिस्सा प्रतिशत रकम किस पर खर्च
ज़रूरतें 50% 15,000 रुपये किराया, राशन, बिल, आना-जाना
इच्छाएँ 30% 9,000 रुपये बाहर खाना, शॉपिंग, मनोरंजन
बचत 20% 6,000 रुपये इमरजेंसी फंड, SIP

सिर्फ़ 6,000 रुपये महीने की बचत भी साल में 72,000 रुपये बन जाती है। यही रकम अगर लगातार कुछ साल चले, तो नौकरी छूटने, बीमारी या शादी जैसे मौके पर आपको किसी से उधार नहीं माँगना पड़ेगा।

भारत के हिसाब से थोड़ा बदलाव

बड़े शहरों में अकेले किराया ही सैलरी का 35 से 40 प्रतिशत खा जाता है। ऐसे में 50 प्रतिशत में सारी ज़रूरतें पूरी करना मुश्किल लगता है। घबराइए नहीं, नियम को अपनी हालत के हिसाब से ढाल सकते हैं:

  • किराया बहुत ज़्यादा है: 60-20-20 अपनाइए। ज़रूरतें 60, इच्छाएँ 20, बचत 20। बचत का हिस्सा न घटाएँ, इच्छाओं से काटें।
  • घर से रहते हैं और किराया नहीं है: 40-30-30 कीजिए। यही वह समय है जब सबसे ज़्यादा बचत हो सकती है।
  • कर्ज़ या क्रेडिट कार्ड का बकाया है: पहले बचत वाले 20 प्रतिशत से महंगा कर्ज़ चुकाइए, क्योंकि उस पर लगने वाला ब्याज़ किसी भी निवेश के रिटर्न से ज़्यादा होता है।

मकसद प्रतिशत को रटना नहीं, बल्कि यह पक्का करना है कि बचत हर महीने हो, चाहे शुरुआत 10 प्रतिशत से ही क्यों न हो।

सैलरी जल्दी खत्म होने की 5 असली वजहें

  1. पहले खर्च, बाद में बचत। जो बचता है उसे बचाने की आदत में कुछ नहीं बचता। उल्टा कीजिए: पहले बचत, फिर बाकी खर्च।
  2. छोटे-छोटे खर्च। रोज़ की 100-150 रुपये की चाय, स्नैक्स या डिलीवरी फीस महीने में 3,000 से 4,500 रुपये बन जाती है।
  3. हर सैलरी बढ़ने पर खर्च बढ़ना। इसे लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन कहते हैं। सैलरी 20 प्रतिशत बढ़ी तो खर्च भी 20 प्रतिशत बढ़ गया, बचत वहीं की वहीं।
  4. आसान EMI और अभी खरीदें, बाद में दें वाले ऑफर। छोटी किस्तें सस्ती लगती हैं, पर कई किस्तें मिलकर सैलरी का बड़ा हिस्सा पहले से बाँध देती हैं।
  5. खर्च का हिसाब न रखना। जो दिखता नहीं, वो काबू में भी नहीं आता।

आज से शुरू करने के 6 आसान कदम

  1. दो खाते रखिए। सैलरी वाला खाता खर्च के लिए और दूसरा अलग खाता सिर्फ़ बचत के लिए, जिसका डेबिट कार्ड रोज़ साथ न रखें।
  2. सैलरी वाले दिन ही ऑटो ट्रांसफर। बैंक ऐप में स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन या SIP की तारीख सैलरी के अगले दिन रखिए, ताकि बचत अपने आप हो जाए।
  3. एक महीना हर खर्च लिखिए। नोटबुक या फोन के नोट्स में। महीने के अंत में हर खर्च को ज़रूरत, इच्छा या बचत में बाँटिए। आँखें खुल जाएँगी।
  4. इच्छाओं के लिए अलग रकम तय कीजिए। 30 प्रतिशत आपका है, उसे बिना अपराधबोध के खर्च कीजिए, बस उससे ज़्यादा नहीं।
  5. पहले इमरजेंसी फंड। कम से कम 3 से 6 महीने के ज़रूरी खर्च जितना पैसा अलग रखिए। उसके बाद लंबे समय का निवेश शुरू कीजिए।
  6. हर साल नियम दोबारा देखिए। सैलरी बढ़े तो बढ़ी हुई रकम का कम से कम आधा हिस्सा सीधे बचत में डालिए।

किन गलतियों से बचें

  • बचत के नाम पर पूरा 20 प्रतिशत एक ही जगह, जैसे सिर्फ़ FD या सिर्फ़ शेयर में न डालें। ज़रूरत और समय के हिसाब से बाँटें।
  • इमरजेंसी फंड को घूमने या शॉपिंग पर खर्च न करें। यह सिर्फ़ मुसीबत के लिए है।
  • दूसरों की देखा-देखी खर्च न करें। आपका बजट आपकी सैलरी से तय होगा, दोस्तों की पोस्ट से नहीं।

आखिरी बात

50-30-20 कोई जादू नहीं, बल्कि आदत है। पहले महीने शायद आप पूरा पालन न कर पाएँ, और यह बिल्कुल ठीक है। ज़रूरी यह है कि अगली सैलरी आने पर सबसे पहला काम बचत का हो। तीन महीने बाद आप फर्क खुद महसूस करेंगे, जब महीने के आखिरी हफ्ते में भी खाते में पैसे बचे होंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

50-30-20 नियम में सैलरी कौन-सी गिननी है?

वो रकम जो टैक्स, PF और दूसरे कटौती के बाद हर महीने आपके खाते में आती है, यानी हाथ में आने वाली सैलरी।

अगर ज़रूरतों में ही 60 प्रतिशत चला जाता है तो?

इच्छाओं का हिस्सा घटाकर 20 प्रतिशत कर दीजिए और बचत 20 प्रतिशत बनाए रखिए। समय के साथ किराया या दूसरे बड़े खर्च कम करने की कोशिश करें।

EMI किस हिस्से में आती है?

घर या ज़रूरी चीज़ की EMI ज़रूरतों में गिनें। फोन, गैजेट या घूमने के लिए ली गई EMI इच्छाओं में गिनी जानी चाहिए।

कम सैलरी में भी 20 प्रतिशत बचत संभव है?

शुरुआत 5 या 10 प्रतिशत से कीजिए। असली बात बचत की आदत है। जैसे-जैसे आमदनी बढ़े, बचत का प्रतिशत भी बढ़ाते जाइए।

बचत का पैसा कहाँ रखें?

पहले इमरजेंसी फंड के लिए अलग बचत खाता या स्वीप FD ठीक है। लंबे लक्ष्यों के लिए SIP, PPF जैसे विकल्प हैं, पर निवेश से पहले किसी जानकार से सलाह लें।

स्रोत: RBI Financial Education

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