"मुझमें क्या कमी थी?" — रिसर्च कहती है, कमी थी ही नहीं

धोखे का पता चलते ही सबसे पहला सवाल यही उठता है — मुझमें क्या कमी रह गई। पचास साल की रिसर्च कहती है, आधे से ज़्यादा मामलों में कोई कमी थी ही नहीं। और इसका बोझ हमेशा गलत इंसान उठाता आया है।

सुमिता रवानी··5 मिनट

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एक नज़र में

  • जिन मर्दों ने बाहर संबंध बनाए, उनमें से 56% ने अपने घर को खुशहाल बताया
  • "अच्छी बीवी बनोगी तो पति भटकेगा नहीं" — इस बात का कोई रिसर्च आधार नहीं है
  • पैटर्न उल्टा निकला — भटकने वाला घर से कम ले नहीं रहा था, वो घर को कम दे रहा था
  • औरतों का मामला अलग है — उनके भटकने के पीछे अक्सर सच में घर की कमी मिली
  • अफेयर रोमांस से नहीं, दोस्ती से शुरू होते हैं, और पहला संकेत होता है छिपाना

धोखे का पता चलने के बाद जो पहला सवाल आता है, वो ये नहीं होता कि उसने ऐसा क्यों किया।

पहला सवाल होता है — मुझमें क्या कमी रह गई?

घर ठीक से नहीं संभाला? वज़न बढ़ गया? पहले जैसी बात नहीं करती थी? नौकरी में ज़्यादा उलझ गई थी? ये सवाल रात के दो बजे सबसे ज़्यादा चुभता है। और इसका जवाब कभी नहीं मिलता, क्योंकि सवाल ही गलत जगह से शुरू होता है।

एक रिसर्च ने पूरी सोच पलट दी

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक शिर्ली ग्लास ने 1975 में इस पर काम शुरू किया था। खुद उनका मानना यही था कि अगर कोई मर्द बाहर संबंध बनाता है तो ज़रूर उसके घर में कुछ गड़बड़ होगी।

फिर उन्होंने अपने ही आंकड़े देखे।

जिन मर्दों ने बाहर संबंध बनाए थे, उनमें से 56 फीसदी ने अपने घर को खुशहाल बताया। औरतों में ये आंकड़ा 34 फीसदी निकला।

यानी आधे से ज़्यादा मर्द ऐसे थे जिनके घर में कोई कलह नहीं थी। बीवी में कोई कमी नहीं थी। सब ठीक चल रहा था। फिर भी उन्होंने धोखा दिया।

ग्लास ने खुद लिखा कि ये नतीजा उनकी अपनी सोच के खिलाफ था। उन्होंने माना कि औरत सब कुछ बेहतरीन कर सकती है, और आदमी फिर भी भटक सकता है — अगर भटकना उसके अपने ढांचे में है।

"अच्छी बीवी बनो, पति भटकेगा नहीं"

ये बात हमारे यहां इतनी आम है कि लोग इसे सच मान बैठे हैं।

किसी रिसर्च ने इसे सही नहीं पाया।

लेकिन असर देखिए। धोखा सामने आते ही सवाल औरत से शुरू होते हैं। "तूने ध्यान नहीं दिया होगा।" "काम में ज़्यादा लगी रहती थी।" "मायके ज़्यादा जाती थी।" जिसके साथ गलत हुआ, पूछताछ उसी की होती है।

इस सोच का सबसे बड़ा नुकसान यही है। बोझ हमेशा गलत इंसान के कंधे पर चला जाता है। जिसके साथ हुआ वो खुद को दोषी मानने लगती है, और जिसने किया उसे एक तैयार बहाना मिल जाता है — "घर में कुछ मिलता ही नहीं था।"

असल पैटर्न उल्टा है

ग्लास की सबसे तीखी बात यही थी:

लोग समझते हैं कि भटकने वाले को घर में कुछ मिल नहीं रहा था। सच ये है कि वो घर को कुछ दे नहीं रहा था।

छोटी सी बात है, पर पूरी तस्वीर बदल देती है।

जो इंसान रिश्ते में मेहनत लगाता है, वक्त देता है, कोशिश करता है — वो उतना ही जुड़ा भी रहता है। जो आधे मन से जुड़ा है, वो बाहर जाने के लिए उतना ही खाली है। कम लगाव धोखे का नतीजा नहीं होता। अक्सर वही शुरुआत होती है।

औरतों का मामला अलग है

यहां एक ज़रूरी बात है, वरना बात एकतरफा हो जाएगी।

ग्लास ने पाया कि लंबी शादियों में जिन औरतों ने बाहर संबंध बनाए, उनकी अपने घर से खुशी सबसे कम थी — सारे समूहों में सबसे नीचे। मतलब औरतों के मामले में "घर में कुछ टूट चुका था" वाली बात अक्सर सच निकलती है।

उनका निष्कर्ष था कि मर्द ज़्यादातर शारीरिक रिश्ते की तरफ जाते हैं, औरतें भावनात्मक की तरफ। औरत के लिए अफेयर अक्सर उस चीज़ की तलाश होता है जो घर में खत्म हो चुकी है। मर्द के लिए ये ज़रूरी नहीं।

तो सवाल ये कि क्या धोखा हमेशा खराब शादी की निशानी है — औरतों में अक्सर हां, मर्दों में अक्सर नहीं। दोनों को एक ही तराजू में तौलना गलत है।

अफेयर रोमांस से नहीं, दोस्ती से शुरू होता है

फिल्मों में अफेयर किसी नाटकीय पल में शुरू होता है। असल में ये इतने धीरे होता है कि करने वाले को भी पता नहीं चलता।

ग्लास ने इसे समझाने के लिए दीवार और खिड़की की मिसाल दी।

ठीक चलते रिश्ते में दीवार बाहर की तरफ होती है और खिड़की अपने साथी की तरफ। यानी थकान, परेशानी, खुशी — सब सबसे पहले घर में बंटती है, और बाहर वालों से एक हद बनी रहती है।

अफेयर तब बनता है जब ये उल्टा हो जाता है। दीवार साथी और आपके बीच खड़ी हो जाती है, और खिड़की किसी बाहर वाले की तरफ खुल जाती है।

दो सवाल जो इसे तुरंत पकड़ लेते हैं

  • क्या मैं इस इंसान से वो बातें कह रहा हूं जो अपने साथी से नहीं कहता?
  • क्या इस दोस्ती का कोई हिस्सा मैं छिपा रहा हूं?

दोनों का जवाब हां है, तो एक भी रोमांटिक बात हुए बिना हद पार हो चुकी है। छिपाना पहला संकेत है, आखिरी नहीं।

ग्लास ने ये भी देखा कि आजकल ज़्यादातर अफेयर दफ्तर में बनते हैं। और वो पुराने "बॉस और सेक्रेटरी" वाले ढांचे में फिट नहीं बैठते। वहां मर्द-औरत बराबरी से काम करते हैं, घंटों साथ रहते हैं, और यही नज़दीकी धीरे-धीरे आदत बन जाती है।

तो इससे निकलता क्या है

अगर आपके साथ हुआ है — "मुझमें क्या कमी थी" वाला सवाल छोड़ दीजिए। आंकड़े कहते हैं आधे से ज़्यादा मामलों में कमी वाली बात लागू ही नहीं होती। जो हुआ, वो उस इंसान के फैसले से निकला। आपकी किसी कमी से नहीं।

अगर रिश्ता बचाना है — ग्लास की रिसर्च में एक और बात मिली। जब गलती करने वाला हर सवाल का पूरा जवाब देता है, कुछ नहीं छिपाता, तो साथ रहने की संभावना बहुत ऊपर चली जाती है। यानी शर्त माफी नहीं, पूरी सफाई है। और जोड़ने की ज़िम्मेदारी उसकी है जिसने तोड़ा।

अगर बचाव की सोच रहे हैं — शक और जासूसी से कुछ नहीं होता। दीवार और खिड़की वाली बात सीधी रखिए। घर की बात पहले घर में, बाहर एक साफ हद।

एक ज़रूरी बात

ये रिसर्च अमेरिका की है और इसका बड़ा हिस्सा दशकों पुराना है। भारत में संयुक्त परिवार का दबाव, पैसों की निर्भरता, तलाक का सामाजिक डर — इन सबका असर अलग पड़ता है। इस पर भरोसेमंद भारतीय आंकड़े लगभग हैं ही नहीं।

तो इन फीसदी को पत्थर की लकीर मत मानिए।

लेकिन एक बात हर अध्ययन में टिकी रही। "अच्छी बीवी होती तो ऐसा न होता" — ये वाक्य किसी सबूत पर खड़ा नहीं है। ये बस एक पुरानी आदत है, जिसका बोझ हमेशा गलत इंसान ने उठाया है।

शायद इस पूरी रिसर्च की सबसे काम की बात यही है।

स्रोत

  • शिर्ली पी. ग्लास, Not "Just Friends" (2003)
  • ग्लास के शोध पत्र — वैवाहिक संतुष्टि, शादी की अवधि और लिंग-भेद पर

लोग समझते हैं कि भटकने वाले को घर में कुछ मिल नहीं रहा था। सच ये है कि वो घर को कुछ दे नहीं रहा था।

सुमिता रवानी

सुमिता रवानी

सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट — सरकारी योजना और नागरिक सेवाएं

सुमिता रवानी 8 साल से केंद्र और राज्य सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं पर लिख रही हैं। उनका काम सरकारी अधिसूचनाओं और पोर्टल की उलझी भाषा को आम पाठक के लिए आसान बनाना है। वे विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाओं तक पहुँच की समस्या पर रिपोर्टिंग करती रही हैं।

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