18 महीने की शादी, ₹4 करोड़ का तलाक: महिला ने मांगे 12 करोड़ + BMW
18 महीने चली शादी, ₹12 करोड़ की मांग, मुंबई में फ्लैट और ऊपर से एक BMW — सुप्रीम कोर्ट ने इन मांगों को "अत्यधिक और अनुचित" बताते हुए खारिज कर दिया।
एक नज़र में
- शादी सिर्फ 18 महीने चली, लेकिन कानूनी लड़ाई 8 साल तक खिंची।
- पत्नी ने स्थायी गुजारा भत्ते के तौर पर ₹12 करोड़, मुंबई में मुफ्त फ्लैट और एक BMW कार की मांग रखी थी।
- सुप्रीम कोर्ट ने दो विकल्प दिए — बिना किसी शर्त के फ्लैट, या ₹4 करोड़ एकमुश्त।
- पति की LinkedIn प्रोफाइल को आय का सबूत मानने से कोर्ट ने साफ इनकार कर दिया।
- 2022 का आपसी समझौता बाध्यकारी माना गया; 498A और 406 के आपराधिक मामले रद्द कर दिए गए।
"शादी सिर्फ 18 महीने चली और आप एक करोड़ महीना मांग रही हैं?" — सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तत्कालीन CJI बी.आर. गवई की यह टिप्पणी सुर्खियों में आ गई। मामला एक ऐसे दंपति का था जिनकी शादी डेढ़ साल भी नहीं टिकी, लेकिन तलाक की लड़ाई आठ साल तक अदालतों में घिसटती रही।
मामला क्या था
पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में स्थायी गुजारा भत्ते की मांग रखी थी — मुंबई में एक फ्लैट बिना किसी कीमत के, और ₹12 करोड़ एकमुश्त सेटलमेंट के तौर पर। CJI बी.आर. गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने इस पर सवाल उठाया। इसके अलावा एक BMW कार की मांग भी सूची में शामिल थी, जिसे कोर्ट ने "अत्यधिक और अनुचित" करार दिया।
"आप पढ़ी-लिखी हैं, खुद कमाइए"
जब बेंच ने महिला से उनकी योग्यता पूछी तो उन्होंने बताया कि वे MBA हैं और IT सेक्टर में काम कर चुकी हैं। इस पर CJI गवई ने कहा कि वे बेंगलुरु या हैदराबाद जैसे शहरों में आसानी से नौकरी पा सकती हैं। उन्होंने जोड़ा कि जो लोग पढ़े-लिखे हैं और काम करने में सक्षम हैं, उन्हें नौकरी से बचकर बड़ी रकम की मांग नहीं करनी चाहिए — "आपको खैरात पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, आपको कमाना चाहिए और सम्मान से जीना चाहिए।"
फैसले में कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि महिला ग्रेजुएट इंजीनियर हैं, उनके पास मैनेजमेंट में पोस्ट-ग्रेजुएट डिग्री है और IT क्षेत्र का अनुभव है — यानी वे खुद का भरण-पोषण करने में पूरी तरह सक्षम हैं।
LinkedIn प्रोफाइल सैलरी स्लिप नहीं है
इस केस का सबसे दिलचस्प पहलू यहीं था। पत्नी की ओर से दलील दी गई कि पति की LinkedIn प्रोफाइल पर अब भी Citibank नियोक्ता के रूप में दर्ज है, इसलिए उनकी सालाना आय ₹2.5 करोड़ से ऊपर होनी चाहिए। बेंच ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वह LinkedIn प्रोफाइल पर कोई भरोसा नहीं करेगी। कोर्ट ने पति का यह पक्ष स्वीकार किया कि वे अब Citibank में नहीं हैं और उनकी मौजूदा आय लगभग ₹18 लाख सालाना है।
सोशल मीडिया प्रोफाइल को आय का प्रमाण मानने से इनकार करना इस फैसले की सबसे व्यावहारिक सीख है — डिजिटल फुटप्रिंट सबूत नहीं होता।
₹4 करोड़ या फ्लैट — कोर्ट ने दिए दो विकल्प
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महिला के सामने दो विकल्प रखे — या तो बिना किसी कानूनी शर्त के फ्लैट स्वीकार करें, या ₹4 करोड़ की एकमुश्त रकम ले लें। कोर्ट ने 21 जुलाई को आदेश सुरक्षित रख लिया था।
अंतिम फैसले में कोर्ट ने 2022 के आपसी समझौते को बाध्यकारी माना, जिसके तहत महिला ने कल्पतरु हैबिटैट में एक फ्लैट और दो पार्किंग स्पॉट को पूर्ण और अंतिम सेटलमेंट के रूप में स्वीकार किया था। उस समझौते में न ₹12 करोड़ का जिक्र था, न किसी BMW का। कोर्ट ने कहा कि समझौते के वक्त स्थायी गुजारा भत्ते का कोई दावा नहीं किया गया था, और दबाव में हस्ताक्षर कराने के आरोप का कोई सबूत नहीं मिला।
कोर्ट ने यह भी संज्ञान लिया कि पति हाउसिंग सोसाइटी का ₹25.90 लाख बकाया चुकाने को तैयार थे, ताकि फ्लैट बिना किसी अड़चन के ट्रांसफर हो सके।
आपराधिक मामले भी रद्द
कोर्ट ने पत्नी द्वारा IPC की धारा 498A और 406 के तहत दर्ज कराए गए दोनों आपराधिक मामले रद्द कर दिए और दोनों पक्षों को इस विवाद में आगे कोई मुकदमेबाजी शुरू करने से रोक दिया। फैसला औपचारिक रूप से तभी प्रभावी होना था जब फ्लैट ट्रांसफर हो जाए और सोसाइटी का बकाया चुक जाए।
इस फैसले का बड़ा संदेश
यह फैसला अकेला नहीं है, बल्कि गुजारा भत्ते पर बदलती न्यायिक सोच का हिस्सा है। इससे निकलने वाले सिद्धांत साफ हैं:
- आपसी समझौते तब तक बाध्यकारी हैं जब तक ठोस सबूत से उन्हें चुनौती न दी जाए।
- सोशल मीडिया की प्रोफेशनल प्रोफाइल वित्तीय दस्तावेज नहीं मानी जाएंगी।
- ऊंची योग्यता और रोजगार क्षमता लंबी अवधि के भत्ते के खिलाफ जा सकती है।
- समझौते के बाद की मांगों को कानून और निष्पक्षता की कसौटी पर खरा उतरना होगा — सिर्फ आकांक्षा काफी नहीं।
साथ ही कोर्ट ने यह भी दोहराया कि गुजारा भत्ता केवल गुजर-बसर भर का नहीं, बल्कि जीवनशैली और भविष्य की जरूरतों को दर्शाने वाला होना चाहिए — लेकिन बड़ी वित्तीय मांगों के पीछे असली सबूत होना जरूरी है, अनुमान नहीं।
"शादी सिर्फ 18 महीने चली और आप एक करोड़ महीना मांग रही हैं? आप अच्छी तरह पढ़ी-लिखी हैं — आपको खैरात पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, कमाना चाहिए और सम्मान से जीना चाहिए।" — CJI बी.आर. गवई
सुमिता रवानी
सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट — सरकारी योजना और नागरिक सेवाएं
सुमिता रवानी 8 साल से केंद्र और राज्य सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं पर लिख रही हैं। उनका काम सरकारी अधिसूचनाओं और पोर्टल की उलझी भाषा को आम पाठक के लिए आसान बनाना है। वे विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाओं तक पहुँच की समस्या पर रिपोर्टिंग करती रही हैं।
