सुप्रीम कोर्ट 40 साल से कह रहा है, फिर भी लोग यही गलती करते हैं
हर बैंक खाते, एफडी और बीमा पॉलिसी में नॉमिनी का कॉलम भरा जाता है। ज़्यादातर लोग मानते हैं कि नाम लिख देने से वो पैसा उसी का हो गया। सुप्रीम कोर्ट 1984 से लगातार कह रहा है कि ऐसा नहीं है
एक नज़र में
- नॉमिनी पैसा पाने वाला है, मालिक नहीं। कानून की नज़र में वो कानूनी वारिसों के लिए सिर्फ़ ट्रस्टी है।
- नॉमिनेशन फॉर्म वसीयत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में फिर से यही दोहराया।
- बैंक नॉमिनी को पैसा दे देगा — पर उससे बाकी वारिसों का हक़ ख़त्म नहीं होता।
- जिसे सच में देना है, उसका नाम वसीयत में लिखिए। नॉमिनी और वसीयत दोनों अलग काम करते हैं।
बैंक में खाता खोलते वक़्त एक फॉर्म मिलता है जिसमें नॉमिनी का नाम लिखना होता है। ज़्यादातर लोग वहाँ पत्नी, बेटे या माँ का नाम लिख देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
मन में बात ये रहती है — मेरे बाद ये पैसा इसी को मिलेगा, काम ख़त्म।
कानून ये नहीं कहता। और ये कोई नई या छिपी हुई बात नहीं है। सुप्रीम कोर्ट 1984 से यही समझा रहा है।
नॉमिनी होता क्या है
सोचिए किसी ने अपनी चाबी पड़ोसी को दे रखी है, ये कहकर कि मेरे न रहने पर घर खोल देना।
पड़ोसी के पास चाबी है। वो दरवाज़ा खोल भी सकता है। लेकिन घर उसका नहीं हो जाता।
नॉमिनी की हैसियत बिल्कुल यही है। बैंक को एक नाम चाहिए होता है ताकि खाताधारक के न रहने पर पैसा किसी को सौंपा जा सके और खाता बंद हो सके। बस इतना ही काम है नॉमिनेशन का।
कानूनी भाषा में इसे ट्रस्टी कहते हैं — यानी वो व्यक्ति जो पैसा अपने पास रखता है, पर असली हक़दारों के लिए।
अदालतें क्या कहती रही हैं
1984 में सरबती देवी बनाम उषा देवी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा कि बीमा पॉलिसी का नॉमिनी सिर्फ़ कानूनी वारिसों के लिए पैसा लेता है। मालिक वो नहीं बनता।
चालीस साल बाद भी ग़लतफ़हमी बनी रही, इसलिए 2023 में शक्ति येज़दानी बनाम जयानंद साल्गांवकर के मामले में कोर्ट ने वही बात दोबारा कही।
उस फ़ैसले में एक बात और तय हुई जो याद रखने लायक़ है — नॉमिनेशन वसीयत नहीं है।
वसीयत बनाने के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। गवाह चाहिए, तरीक़ा तय है। नॉमिनेशन फॉर्म पर ऐसी कोई शर्त नहीं होती — एक नाम, एक दस्तख़त, बात ख़त्म। इतनी हल्की प्रक्रिया से बनी चीज़ को वसीयत के बराबर नहीं माना जा सकता।
फिर बैंक पैसा दे क्यों देता है
यहीं पर सबसे ज़्यादा उलझन होती है।
रिज़र्व बैंक के नियमों के तहत बैंक नॉमिनी को पैसा सौंप सकता है, बिना ये जाँचे कि कानूनी हक़ असल में किसका बनता है। बैंक का काम इतना ही है कि पैसा सही हाथ में जाए और उसकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो।
लेकिन पैसा मिल जाने से मालिकाना हक़ नहीं आता। अगर बाद में कोई वारिस दावा करता है, तो नॉमिनी को हिसाब देना पड़ सकता है।
यानी बैंक की प्रक्रिया अलग चीज़ है और उत्तराधिकार का कानून अलग।
असली दिक्कत कहाँ आती है
मान लीजिए किसी आदमी ने अपने बैंक खाते में बड़े बेटे का नाम नॉमिनी लिखा। उसके बाद परिवार में पत्नी, दो बेटे और एक बेटी हैं।
पिता के न रहने पर बैंक पूरा पैसा बड़े बेटे को दे देगा। बड़ा बेटा मान बैठेगा कि पिता ने उसे ही देना चाहा था।
लेकिन कानून के हिसाब से वो पैसा चारों में बँटना है, और बड़ा बेटा सिर्फ़ उसे संभालकर रखने वाला है।
अगर परिवार में समझ बनी रहे तो कोई दिक़्क़त नहीं होती। लेकिन जहाँ नहीं बनती, वहीं से मुक़दमा शुरू होता है — और सालों चलता है।
करना क्या चाहिए
तीन बातें।
पहली, नॉमिनी ज़रूर भरिए। इससे परिवार को पैसा जल्दी मिलता है और महीनों की भागदौड़ बचती है। ख़ाली छोड़ देना उससे भी बुरा है।
दूसरी, अगर आप चाहते हैं कि पैसा किसी ख़ास व्यक्ति को ही मिले, तो वसीयत बनवाइए। नॉमिनेशन उस काम के लिए बना ही नहीं है। वसीयत ही वो दस्तावेज़ है जो तय करता है कि किसे क्या मिलेगा।
तीसरी, ज़िंदगी में बड़ा बदलाव होने पर नॉमिनेशन दोबारा देखिए। शादी, बच्चे का जन्म, तलाक़, या नॉमिनी का ख़ुद न रहना — इन सबके बाद पुराना नाम पड़ा रहना बहुत आम है।
बैंक खाता, एफडी, बीमा, पीएफ, म्यूचुअल फंड, डीमैट — हर जगह अलग-अलग नॉमिनी हो सकते हैं। ज़्यादातर लोगों को याद ही नहीं रहता कि कहाँ किसका नाम लिखा है।
एक शाम बैठकर सब जगह की जाँच कर लेना, इस पूरे लेख की सबसे काम की सलाह यही है।
पड़ोसी के पास चाबी है। वो दरवाज़ा खोल भी सकता है। लेकिन घर उसका नहीं हो जाता।
कामिनी सोरेला
सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट — पर्सनल फाइनेंस
कामिनी सोरेला पिछले 9 साल से डिजिटल पेमेंट, बैंकिंग नियम और पर्सनल फाइनेंस कवर करती हैं। RBI और NPCI के सर्कुलर को आम भाषा में समझाना उनका काम है। पहले दो नेशनल बिज़नेस चैनलों में रिपोर्टिंग कर चुकी हैं।
